29 January 2015
महान सपने देखने वालों के महान सपने हमेशा पूरे होते हैं. - अब्दुल कलाम इंसान को कठिनाइयों की आवश्यकता होती है, क्योंकि सफलता का आनंद उठाने कि लिए ये ज़रूरी हैं. - अब्दुल कलाम सभी प्रचार लोकप्रिय होने चाहिए और इन्हें जिन तक पहुचाना है उनमे से सबसे कम बुद्धिमान व्यक्ति के भी समझ में आने चाहियें . - अडोल्फ़ हिटलर हजारों खोखले शब्दों से अच्छा वह एक शब्द है जो शांति लाये. - भगवान गौतम बुद्ध आपके पास जो कुछ भी है है उसे बढ़ा-चढ़ा कर मत बताइए, और ना ही दूसरों से इर्श्या कीजिये. जो दूसरों से इर्श्या करता...
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28 January 2015
THE EIGHTH WONDER TO BE …..‘THE SHIVAPURAM’ (Project Conceived and Presented by CA A. K. Jain) LORD SHIVA IN CENTER OF 21 CIRCLES OF SHIVAPURAM ‘THE SHIVAPURAM’ For centuries “Taj Mahal” is India’s exclusive source of pride and joy. It’s magnificent architecture has mesmerized people across the globe. We too have presented this tombstone to the world’s who’s who to seek their approbation. It is really commendable, that the Mughal Emperor Shahjahan envisioned and accomplished this epic structure...
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23 January 2015
कोशिश करने वालों की लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है, चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है। मन का विश्वास रगों में साहस भरता है, चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है। आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है, जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है। मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में, बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में। मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती, कोशिश करने...
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22 January 2015
सूरज को नही डूबने दूंगा अब मै सूरज को नही डूबने दूंगा देखो मैने कंधे चौडे कर लिये हैं मुट्ठियाँ मजबूत कर ली हैं और ढलान पर एडियाँ जमाकर खडा होना मैने सीख लिया है घबराओ मत मै क्षितिज पर जा रहा हूँ सूरज ठीक जब पहाडी से लुढकने लगेगा मै कंधे अडा दूंगा देखना वह वहीं ठहरा होगा अब मै सूरज को नही डूबने दूंगा मैने सुना है उसके रथ मे तुम हो तुम्हे मै उतार लाना चाहता हूं तुम जो स्वाधीनता की प्रतिमा हो तुम जो साहस की मुर्ति हो तुम जो धरती का सुख हो तुम जो कालातीत प्यार हो तुम जो मेरी धमनी का प्रवाह हो तुम ज...
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22 January 2015
नर हो न निराश करो मन को नर हो न निराश करो मन को कुछ काम करो कुछ काम करो जग में रहके निज नाम करो यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो कुछ तो उपयुक्त करो तन को नर हो न निराश करो मन को । संभलो कि सुयोग न जाए चला कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला समझो जग को न निरा सपना पथ आप प्रशस्त करो अपना अखिलेश्वर है अवलम्बन को नर हो न निराश करो मन को । जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो उठके अमरत्व विधान करो दवरूप रहो भव कानन को नर हो न निराश करो मन क...
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22 January 2015
एक बूँद ज्यों निकल कर बादलों की गोद से। थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी।। सोचने फिर फिर यही जी में लगी। आह क्यों घर छोड़कर मैं यों बढ़ी।। दैव मेरे भाग्य में क्या है बढ़ा। में बचूँगी या मिलूँगी धूल में।। या जलूँगी गिर अंगारे पर किसी। चू पडूँगी या कमल के फूल में।। बह गयी उस काल एक ऐसी हवा। वह समुन्दर ओर आई अनमनी।। एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला। वह उसी में जा पड़ी मोती बनी।। लोग यों ही है झिझकते, सोचते। जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर।। किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें। बूँद लौं कुछ और ही देता है कर।। ......
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22 January 2015
अँधेरे का दीपक - हरिवंश राय बच्चन एक बूँद - अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ कोशिश करने वालों की - हरिवंशराय बच्चन जीवन की आपाधापी में - हरिवंश राय बच्चन नर हो न निराश करो मन को - मैथिलीशरण गुप्त सूरज को नही डूबने दूंग - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
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22 January 2015
जीवन की आपाधापी में जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला। जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में, हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा, आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा? फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में, क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी, जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा, जो किया, उसी...
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22 January 2015
अँधेरे का दीपक है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है? कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था , भावना के हाथ से जिसमें वितानों को तना था, स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा, स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था, ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर कंकड़ों को एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है? है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है? बादलों के अश्रु से धोया गया नभनील नीलम का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम, प्रथम उशा की किरण की लालिमासी लाल मदिरा थी उसी में चमचमाती नव घन...
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21 January 2015
All The World's A Stage All the world's a stage, And all the men and women merely players: They have their exits and their entrances; And one man in his time plays many parts, His acts being seven ages. At first, the infant, Mewling and puking in the nurse's arms. And then the whining school-boy, with his satchel And shining morning face, creeping like snail Unwillingly to school. And then the lover, Sighing like furnace, with a woeful ballad Made to his mistress' eyebrow. Then a soldier, Full o...
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